सोमवार 13 जुलाई 2026 - 15:54
आयतुल्लाहिल उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी; इल्म, मरजेईयत, दूरदृष्टि और दृढ़ता का एक उज्ज्वल अध्याय

शिया इतिहास में कुछ ऐसी महान हस्तियाँ हुई हैं जिनकी सेवाएँ केवल शिक्षा-दीक्षा, फ़िक़्ह, इज्तेहाद या धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने अपने चरित्र, दूरदृष्टि और निर्भीकता से पूरे युग की दिशा तय की। आयतुल्लाहिल उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी ऐसी ही विलक्षण विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने तेरहवीं और चौदहवीं हिजरी शताब्दी में ईरान के धार्मिक, शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।

अनुवाद एवं संकलन: मौलानय् सैयद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | शिया इतिहास में कुछ ऐसी महान हस्तियाँ हुई हैं जिनकी सेवाएँ केवल शिक्षा-दीक्षा, फ़िक़्ह, इज्तेहाद या धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने अपने चरित्र, दूरदृष्टि और निर्भीकता से पूरे युग की दिशा तय की। आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी ऐसी ही विलक्षण विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने तेरहवीं और चौदहवीं हिजरी शताब्दी में ईरान के धार्मिक, शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।

हाजी मुल्ला अली कनी ईरान के प्रमुख फ़क़ीह, उसूली विद्वान, हदीस विशेषज्ञ, इल्म-ए-रिजाल (हदीस वर्णनकर्ताओं के अध्ययन) के विद्वान, क़ुरआन के व्याख्याकार और मरजा-ए-तक़लीद थे। फ़िक़्ह, उसूल-ए-फ़िक़्ह, इल्म-ए-रिजाल, इल्म-ए-हदीस और क़ुरआन की तफ़्सीर में उनकी असाधारण विशेषज्ञता सर्वमान्य थी। उन्होंने नजफ़ अशरफ़ और कर्बला के महान धार्मिक शिक्षण केंद्रों में अपने समय के प्रतिष्ठित विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद तेहरान लौटकर धार्मिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी संभाली और अपना पूरा जीवन धर्म, समाज और देश की सेवा में समर्पित कर दिया।

उनका व्यक्तित्व केवल विद्वता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे दूरदर्शी नेता, जनता के हितैषी, पीड़ितों के समर्थक और अत्याचारी शासकों के सामने सत्य बोलने वाले निर्भीक मुजतहिद भी थे। यही कारण था कि नासिरुद्दीन शाह क़ाजार जैसे शक्तिशाली शासक भी उनके आध्यात्मिक प्रभाव और जनता में उनकी लोकप्रियता के सामने स्वयं को असहाय महसूस करते थे।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी का जन्म 1220 हिजरी में तेहरान के उत्तर-पश्चिम में स्थित प्राचीन क्षेत्र कन में हुआ। उनके पिता मरहूम मिर्ज़ा क़ुर्बान अली आमुली एक धार्मिक और सदाचारी व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने पुत्र का नाम अली रखा।

उस समय ईरान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था, लेकिन इसी वातावरण में अल्लाह ने ऐसे बालक का पालन-पोषण किया, जो आगे चलकर ज्ञान और फ़िक़्ह का प्रकाशस्तंभ, शिया मरजइयत का आधार और इस्लामी समाज का रक्षक बना।

प्रारंभिक शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति की लगन

बचपन से ही हाजी मुल्ला अली कनी में ज्ञान प्राप्त करने की गहरी इच्छा थी। प्रारंभिक शिक्षा मकतब में प्राप्त करने के बाद उन्होंने धार्मिक शिक्षा हासिल करने का निश्चय किया, लेकिन शुरुआत में परिवार ने इस निर्णय का समर्थन नहीं किया। विरोध के बावजूद उनका ज्ञान-प्रेम कम नहीं हुआ और उन्होंने कुछ समय तक चुपचाप अपनी धार्मिक पढ़ाई जारी रखी।

अंततः परिवार भी उनके दृढ़ संकल्प और निष्ठा से प्रभावित हो गया और उन्हें अनुमति दे दी। इसके बाद उन्होंने तेहरान के हौज़ा-ए-इल्मिया में नियमित रूप से शिक्षा आरंभ की। प्रारंभिक अध्ययन पूरा करने के बाद वे इस्फ़हान गए, जो उस समय इस्लामी शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।

इस्फ़हान में उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान अल्लामा सैयद असदुल्लाह इस्फ़हानी से विभिन्न इस्लामी विज्ञानों का अध्ययन किया। इसके बाद उच्च धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए नजफ़ अशरफ़ गए, जहाँ उनके ज्ञान और व्यक्तित्व का वास्तविक विकास हुआ।

गुरुजन और विद्वतापूर्ण विकास

उस समय भी नजफ़ अशरफ़ फ़िक़्ह और उसूल का सबसे बड़ा शिक्षण केंद्र था। यहाँ हाजी मुल्ला अली कनी को ऐसे महान शिक्षकों का सान्निध्य मिला, जिनका नाम शिया विद्वत्ता के इतिहास में सदा के लिए दर्ज हो गया।

इनमें सबसे प्रमुख थे आयतुल्लाह अल-उज़्मा शेख़ मुहम्मद हसन नजफ़ी, जिन्हें 'साहिब-ए-जवाहर' के नाम से जाना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'जवाहरुल कलाम' आज भी जाफ़री फ़िक़्ह की मूल पुस्तकों में गिनी जाती है। हाजी मुल्ला अली कनी ने उनसे फ़िक़्ह और उसूल के गहन विषयों का अध्ययन किया और उनकी विद्वता से भरपूर लाभ उठाया।

इसी प्रकार आयतुल्लाह अल-उज़्मा शेख़ हसन काशिफ़ुल ग़िता और आयतुल्लाह अल-उज़्मा शेख़ मश्कूर हुलावी नजफ़ी भी उनके प्रमुख शिक्षकों में थे, जिन्होंने फ़िक़्ही अनुसंधान और इज्तेहादी चिंतन में उनका मार्गदर्शन किया।

इसके बाद वे कर्बला के हौज़ा-ए-इल्मिया पहुँचे, जहाँ शरीफ़ुल उलेमा माज़ंदरानी और सैयद इब्राहीम क़ज़वीनी, जिन्हें 'साहिब-ए-ज़वाबित' के नाम से जाना जाता है, जैसे महान विद्वानों की कक्षाओं में सम्मिलित हुए। इन्हीं महान गुरुओं के मार्गदर्शन ने उन्हें इज्तेहाद के उच्च स्तर तक पहुँचाया और फ़िक़्ह, उसूल, हदीस, इल्म-ए-रिजाल तथा क़ुरआन की व्याख्या में उनकी असाधारण दक्षता का मार्ग प्रशस्त किया।

तेहरान वापसी और धार्मिक नेतृत्व

1262 हिजरी में हाजी मुल्ला अली कनी ईरान लौटे और तेहरान को अपनी धार्मिक एवं शैक्षिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। उनकी विद्वता, धर्मपरायणता, सादगी और श्रेष्ठ चरित्र ने शीघ्र ही जनता और विद्वानों दोनों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया।

धीरे-धीरे वे तेहरान के सबसे प्रभावशाली मरजा-ए-तक़लीद बन गए। ईरान के विभिन्न क्षेत्रों से लोग अपने धार्मिक प्रश्न लेकर उनके पास आते थे, जबकि दूर-दराज़ के शहरों से भी लिखित धार्मिक प्रश्न लगातार भेजे जाते थे।

धार्मिक प्रश्नों की बढ़ती संख्या और अनुयायियों के आग्रह पर 1271 हिजरी में उनका रिसाला-ए-अमलिया प्रकाशित किया गया, ताकि लोग अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन अपने मरजा-ए-तक़लीद के फ़तवों के अनुसार कर सकें।

1282 हिजरी में उन्हें मदरसा-ए-मरवी का प्रबंधन सौंपा गया, जहाँ उन्होंने शिक्षा, विद्वानों के प्रशिक्षण और धार्मिक सेवाओं को और अधिक विकसित किया। उनके नेतृत्व में यह मदरसा एक बार फिर प्रमुख शैक्षिक केंद्र बन गया।

इतिहासकार एतमादुस्सल्तनह लिखते हैं कि हाजी मुल्ला अली कनी का प्रभाव इतना व्यापक था कि कई बार सरकारी अधिकारियों के धार्मिक मामलों का निर्णय भी उनकी अदालत में किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी विद्वता के साथ-साथ जनता और सरकार दोनों को उनके निर्णयों पर पूरा विश्वास था।

मरजइयत, जनविश्वास और सामाजिक स्थान

हाजी मुल्ला अली कनी का धार्मिक नेतृत्व केवल फ़तवे देने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जनता के धार्मिक, सामाजिक और नैतिक मामलों के सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक भी थे। लोग पारिवारिक विवादों, आर्थिक मामलों, धार्मिक मतभेदों और अन्य महत्वपूर्ण विषयों में भी उनसे सलाह लेते थे।

समय के साथ ईरान के अधिकांश शिया उनके अनुयायी बन गए, जबकि तेहरान के अधिकांश विद्वान भी उन्हीं के शिष्य थे। उनका व्यक्तित्व ज्ञान, धर्मपरायणता, न्याय और मानव सेवा का सुंदर संगम था। इसी कारण जनता के हृदय में उनके प्रति असाधारण सम्मान और विश्वास था।

राजनीतिक दूरदृष्टि और राष्ट्रीय चेतना

हाजी मुल्ला अली कनी उन विद्वानों में से थे जो धर्म को केवल इबादत तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसे समाज सुधार, न्याय की स्थापना और देश की स्वतंत्रता की रक्षा का आधार मानते थे। इसलिए वे देश की परिस्थितियों पर गहरी नज़र रखते थे और जब भी धर्म या समाज के हितों पर संकट आता, तो पूरी निर्भीकता के साथ अपना पक्ष रखते थे।

उनके समकालीन विद्वान आयतुल्लाह अली असगर जापलक़ी, जो 'साहिब-ए-तराइफ़ुल मक़ाल' के नाम से प्रसिद्ध थे, लिखते हैं कि हाजी मुल्ला अली कनी पीड़ितों का सहारा, शासकों को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व और जनता के सच्चे मार्गदर्शक थे। नासिरुद्दीन शाह क़ाजार भी उनकी राय को अत्यंत महत्व देता था।

1290 हिजरी में जब कुख्यात रॉयटर समझौता हुआ, जिसके तहत ईरान के विशाल राष्ट्रीय संसाधनों को एक विदेशी कंपनी के हवाले किया जा रहा था, तब हाजी मुल्ला अली कनी ने सबसे पहले उसके विरोध में आवाज़ उठाई।

उन्होंने नासिरुद्दीन शाह को एक अत्यंत तर्कपूर्ण, निर्भीक और ऐतिहासिक पत्र लिखा, जिसमें स्पष्ट किया कि जनता की संपत्ति, भूमि, बाग़ों और खनिज संसाधनों को इस प्रकार विदेशियों के हवाले करना न केवल इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि ईरान की संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान के लिए भी गंभीर खतरा है।

उन्होंने यूरोपीय देशों में नागरिक अधिकारों का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी कि यदि यह समझौता लागू हो गया, तो संबंधित कंपनी को ईरान में ऐसे अधिकार मिल जाएंगे जो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारों से भी अधिक व्यापक होंगे। इस पत्र में उन्होंने इस सिद्धांत पर भी ज़ोर दिया कि विद्वानों का कर्तव्य है कि वे शासकों की गलतियों की ओर ध्यान दिलाएँ, चाहे उनकी सलाह मानी जाए या नहीं।

उन्होंने नासिरुद्दीन शाह से माँग की कि वह धर्म और देश के हित को सर्वोपरि रखते हुए उन सभी लोगों को सत्ता से दूर करे जो राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, विशेष रूप से प्रधानमंत्री मिर्ज़ा हुसैन ख़ान सपहसालार को, जिसने इस समझौते का मार्ग प्रशस्त किया था। बाद में शाह ने उसे उसके पद से हटा दिया।

इसी पत्र में उन्होंने मिर्ज़ा मल्कम ख़ान द्वारा स्थापित 'फ़रामोशख़ाना' का भी कड़ा विरोध किया और उसे धार्मिक तथा राष्ट्रीय हितों के लिए हानिकारक बताया।

यह पत्र केवल एक विरोध-पत्र नहीं था, बल्कि एक जागरूक धार्मिक नेता की राजनीतिक दूरदर्शिता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और जननेतृत्व का ऐतिहासिक घोषणापत्र था, जिसने बाद के इस्लामी राजनीतिक चिंतन पर भी गहरा प्रभाव डाला।

विद्वत् साथी और छात्र जीवन

हाजी मुल्ला अली कनी के विद्वतापूर्ण जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन महान हस्तियों की संगति थी, जो आगे चलकर शिया जगत में फ़िक़्ह और मरजइयत के उज्ज्वल सितारे बने। नजफ़ अशरफ़ के हौज़ा-ए-इल्मिया में वे ऐसे प्रतिभाशाली और समर्पित विद्यार्थियों के समूह में थे, जो ज्ञान को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर की प्रसन्नता और धर्म सेवा का माध्यम मानते थे।

उनके कक्ष-सहयोगियों में आयतुल्लाह अल-उज़्मा मुल्ला अली ख़लीली, आयतुल्लाह अल-उज़्मा शेख़ अब्दुलहुसैन तेहरानी (शेख़ अल-इराक़ैन) और आयतुल्लाह अल-उज़्मा सैयद ज़ैनुल आबिदीन तबातबाई हायरी शामिल थे। ये सभी ज्ञान, धर्मपरायणता, सादगी और परस्पर स्नेह में एक-दूसरे के सहयोगी थे। गरीबी, आर्थिक तंगी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनकी ज्ञान-पिपासा कभी कम नहीं हुई।

आयतुल्लाह अल-उज़्मा सैयद ज़ैनुल आबिदीन तबातबाई हायरी ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा:

"नजफ़ में छात्र जीवन के दौरान मैं, शेख़ अब्दुलहुसैन और अख़ूंद मुल्ला अली कनी एक ही कमरे में रहते थे। हम सभी अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन हममें सबसे अधिक निर्धन हाजी मुल्ला अली कनी थे। वे हर सप्ताह एक रात मस्जिद-ए-सहला जाते और इस प्रकार कि किसी को पता न चले, मस्जिद के अलग-अलग कोनों से सूखी रोटियाँ इकट्ठा करके मदरसे ले आते और पूरे सप्ताह उन्हीं के सहारे गुज़ारा करते थे।"

यह घटना केवल गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि उस दृढ़ संकल्प और धैर्य का प्रेरक उदाहरण है, जिसके बल पर एक विद्यार्थी ने जीवन की कठिनाइयों को सहकर ज्ञान और इज्तेहाद की ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं।

इसी प्रकार प्रमुख फ़क़ीह शेख़ मुरतज़ा अंसारी से उनकी मित्रता भी इस्लामी विद्वता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। मुल्ला अली कनी स्वयं कहा करते थे:

"मैं लगभग बीस वर्षों तक कर्बला में शेख़ मुरतज़ा अंसारी का समकालीन और घनिष्ठ मित्र रहा। उनके पास एक पगड़ी के अतिरिक्त कोई सामान नहीं था। गर्मियों की रातों में वे उसी पगड़ी को बिछाकर सो जाते और बाहर निकलते समय उसी को सिर पर बाँध लेते थे।"

ये स्मृतियाँ उस दौर के विद्वानों के सादगीपूर्ण जीवन, निष्ठा और ज्ञान-प्रेम की सर्वोत्तम झलक प्रस्तुत करती हैं।

यात्राएँ और अहल-ए-बैत के प्रति श्रद्धा

हाजी मुल्ला अली कनी ने अपने जीवन में अनेक धार्मिक यात्राएँ कीं। उनके लिए ज़ियारत केवल एक इबादत नहीं थी, बल्कि अहल-ए-बैत के प्रति गहरे प्रेम और आध्यात्मिक नवजीवन का माध्यम थी।

एक बार हज से लौटते समय वे महान मरजा-ए-तक़लीद आयतुल्लाह अल-उज़्मा मिर्ज़ा मुहम्मद हसन शीराज़ी के साथ शाम (सीरिया) पहुँचे, ताकि हज़रत ज़ैनब के पवित्र रौज़े की ज़ियारत कर सकें।

जब दोनों महान विद्वान हरम में प्रवेश किए, तो उन्होंने देखा कि रौज़े की सफ़ाई की उचित व्यवस्था नहीं है, पवित्र ज़रीह पर धूल जमी हुई है और पूरे परिसर की उपेक्षा हो रही है।

यह दृश्य देखकर दोनों अत्यंत दुःखी हुए। उन्होंने किसी सेवक या प्रबंधक का इंतज़ार नहीं किया, बल्कि स्वयं अपनी अबाओं के किनारों से धूल साफ़ करना शुरू कर दिया। उन्होंने हरम के विभिन्न भागों की सफ़ाई की और अपने हाथों से पवित्र रौज़े को व्यवस्थित किया।

यह घटना इस सत्य का प्रतीक है कि वास्तविक महानता पद और प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि विनम्रता, अहल-ए-बैत के प्रति प्रेम और सेवा-भाव में होती है।

शिष्यों का प्रशिक्षण और शैक्षिक सेवाएँ

हाजी मुल्ला अली कनी ने केवल स्वयं ज्ञान प्राप्त नहीं किया, बल्कि ऐसी विद्वानों की पीढ़ी भी तैयार की, जिसने आगे चलकर विभिन्न क्षेत्रों में फ़िक़्ह और अहल-ए-बैत की शिक्षाओं के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी कक्षा से अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों ने शिक्षा प्राप्त की। इनमें प्रमुख नाम हैं: आयतुल्लाह शेख़ मूसा शरारा आमिली, शेख़ मुहम्मद बाक़िर नज्म आबादी, शेख़ असदुल्लाह तेहरानी, सैयद महमूद हयात शाही, सैयद मुहम्मद लवासानी, सैयद मुहम्मद मरअशी, मुल्ला मुहम्मद अली ख़्वानसारी, मुल्ला मुहम्मद तकी संजाबी, मिर्ज़ा हुसैन नायबुस्सद्र, शेख़ मुहम्मद हुसैन गुरगानी और शेख़ हुसैन बाफ़क़ी।

ये सभी आगे चलकर विभिन्न शैक्षिक केंद्रों की शोभा बने और अपने गुरु की विद्वतापूर्ण परंपरा को आगे बढ़ाया।

मोमिनों और जनता के मार्गदर्शक

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी जनता और विद्वानों दोनों के हृदय में अत्यंत सम्मानित स्थान रखते थे। उनकी सादगी, न्यायप्रियता, धर्मपरायणता, मानव सेवा और निर्भीकता ने उन्हें एक अत्यंत लोकप्रिय धार्मिक नेता बना दिया था।

ईरान में अमेरिका के पहले राजदूत सैमुअल ग्रीन व्हीलर बेंजामिन ने अपनी स्मृतियों में लिखा:

"हाजी मुल्ला अली कनी वर्तमान समय के सबसे बड़े मुजतहिद हैं। वे अत्यंत सादा जीवन जीते हैं। यद्यपि वे बड़ी संपत्ति के स्वामी हैं, फिर भी दिखावे से कोसों दूर रहते हैं। जब वे एक सफ़ेद खच्चर पर सवार होकर निकलते हैं, तो लोग उनके चारों ओर इस प्रकार एकत्र हो जाते हैं मानो कोई स्वर्गीय व्यक्तित्व गुज़र रहा हो। यदि वे केवल एक शब्द भी कह दें, तो राजा की सरकार हिल सकती है।"

यह वर्णन उस असाधारण जनविश्वास को दर्शाता है, जो एक धार्मिक नेता को प्राप्त था।

मानव सेवा की भावना

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी का दरवाज़ा हर ज़रूरतमंद व्यक्ति के लिए हमेशा खुला रहता था।

वे अनाथ बच्चों की देखभाल करते थे, गरीब परिवारों के लिए मासिक सहायता निर्धारित करते थे, बीमार और निर्धन लोगों के इलाज का खर्च उठाते थे और ज़रूरतमंदों को दवाइयाँ उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्थाएँ भी स्थापित की थीं।

उन्होंने आम जनता की सुविधा के लिए कई पानी के भंडारण टैंक बनवाए, जबकि यात्रियों की सुविधा के लिए कारवाँ सराय भी बनवाईं। ख़ातूनाबाद की कारवाँ सराय उनकी कल्याणकारी सेवाओं की एक प्रमुख यादगार है।

उनकी मुहर को भी जनता में असाधारण विश्वास प्राप्त था। लोग अपने व्यापारिक समझौतों और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की पुष्टि के लिए उनके पास आते थे, क्योंकि समाज में उनकी ईमानदारी और न्यायप्रियता प्रसिद्ध थी।

अत्याचारी शासकों के सामने एक मज़बूत दीवार

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी की व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पहलू अत्याचार के सामने निर्भय होकर खड़े रहना था।

समकालीन इतिहासकार लिखते हैं कि नासिरुद्दीन शाह क़ाजार अपनी पूरी शाही शक्ति के बावजूद इस धार्मिक नेता के आध्यात्मिक प्रभाव से भयभीत रहता था।

मिर्ज़ा मुहम्मद मेहदी लखनवी लिखते हैं:

"हाजी मुल्ला अली कनी का आदेश इतना प्रभावशाली था कि सुल्तान, राजकुमार और अमीर भी उनकी अनुमति के बिना कोई महत्वपूर्ण कदम उठाने का साहस नहीं करते थे।"

एक दिन नासिरुद्दीन शाह शिकार के लिए शहर से बाहर गया। कुछ दूरी पर पहुँचने के बाद उसने पीछे मुड़कर तेहरान की ओर देखा। अचानक उसके चेहरे का रंग बदल गया और उसने तुरंत वापस लौटने का आदेश दे दिया।

जब दरबारियों ने इसका कारण पूछा तो उसने कहा:

"मेरे दिल में यह विचार आया कि यदि इस समय हाजी मुल्ला अली कनी आदेश दे दें कि शहर का द्वार मेरे लिए बंद कर दिया जाए, तो मैं कुछ भी नहीं कर पाऊँगा। यही सोच मुझे वापस ले आई।"

यह घटना किसी सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि एक ईश्वरीय विद्वान के नैतिक प्रभाव का प्रमाण थी।

सत्य बोलने का अद्वितीय उदाहरण

एक दिन नासिरुद्दीन शाह ने व्यंग्य करते हुए कहा:

"हदीस में आया है कि मेरी उम्मत के विद्वान बनी इस्राईल के नबियों से श्रेष्ठ हैं, तो क्या आप हज़रत मूसा की तरह अपनी लाठी को अजगर बना सकते हैं?"

हाजी मुल्ला अली कनी ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया:

"हाँ, यदि तुम फ़िरऔन की तरह ईश्वर होने का दावा करो, तो हम भी हज़रत मूसा की तरह लाठी को अजगर बना देंगे।"

यह उत्तर केवल त्वरित बुद्धिमत्ता का उदाहरण नहीं था, बल्कि एक अत्याचारी शासक को उसकी वास्तविक स्थिति का एहसास कराने का अत्यंत प्रभावशाली तरीका था।

बुद्धिमत्ता और गरिमा का एक उदाहरण

नासिरुद्दीन शाह के पुत्र कामरान मिर्ज़ा एक बार उनकी सेवा में उपस्थित हुए। बातचीत के दौरान हाजी मुल्ला अली कनी ने कहा:

"मेरे पैर में तकलीफ़ है, इसलिए मैं इसे सीधा करना चाहता हूँ।"

कामरान मिर्ज़ा ने अहंकार के साथ कहा:

"मेरे पैर में भी दर्द है, यदि अनुमति हो तो मैं भी अपना पैर फैला लूँ।"

हाजी मुल्ला अली कनी ने अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ उत्तर दिया:

"मैंने अपना हाथ समेट रखा है, इसलिए अपना पैर फैला रहा हूँ; लेकिन मुझे नहीं लगता कि आपने भी अपना हाथ इस प्रकार समेटा है कि आपको अपना पैर फैलाने की आवश्यकता पड़े।"

यह छोटा सा वाक्य वास्तव में अत्याचार, अहंकार और अनुचित धन-संपत्ति पर एक गहरी टिप्पणी थी।

हाजी मुल्ला अली कनी का पूरा जीवन इस सत्य का उज्ज्वल प्रमाण है कि जब ज्ञान के साथ तक़वा, निष्ठा, साहस और मानव सेवा एकत्र हो जाएँ, तो एक विद्वान न केवल लोगों के दिलों पर शासन करता है, बल्कि इतिहास की दिशा भी बदल देता है। उनकी सादगी, जनता के प्रति प्रेम, शासकों के सामने सत्य बोलने का साहस और अहल-ए-बैत के प्रति अद्वितीय श्रद्धा आज भी विद्वानों और धार्मिक नेताओं के लिए एक उज्ज्वल आदर्श है।

वैज्ञानिक और विद्वतापूर्ण स्थान

हाजी मुल्ला अली कनी अपने समय के प्रमुख फ़क़ीहों, उसूलियों, हदीस विशेषज्ञों और इल्म-ए-रिजाल के विद्वानों में गिने जाते थे। फ़िक़्ह, उसूल-ए-फ़िक़्ह, हदीस, इल्म-ए-रिजाल और क़ुरआन की तफ़्सीर में उन्हें असाधारण महारत प्राप्त थी। उनके इज्तेहाद, गहन अध्ययन और धार्मिक निष्कर्ष निकालने की क्षमता को उनके समय के बड़े विद्वानों ने भी स्वीकार किया। ईरान में उन्हें अपने समय के चार महान मुजतहिदों में गिना जाता था, जबकि उनके फ़िक़्ही विचार बाद के विद्वानों के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बने रहे।

मुल्ला अली कनी अपने समकालीन विद्वानों का सम्मान करने और उनकी सेवाओं को स्वीकार करने में हमेशा आगे रहते थे। विद्वतापूर्ण मतभेदों के बावजूद वे ज्ञानियों के सम्मान और आपसी सहयोग को धार्मिक प्रगति का आवश्यक माध्यम मानते थे।

नैतिक गुण

यद्यपि मुल्ला अली कनी के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन थे, लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन तपस्या, संतोष, सादगी और इबादत का उदाहरण था। वे अपनी संपत्ति को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के बजाय जनता की भलाई, गरीबों की सहायता, अनाथों की देखभाल, रोगियों के इलाज और धार्मिक संस्थानों के संरक्षण पर खर्च करते थे।

उनके व्यक्तित्व में विनम्रता, धैर्य, उदारता, न्यायप्रियता, सत्य बोलने का साहस और निर्भीकता प्रमुख गुण थे। राजा और अमीर भी उनके सामने सम्मान के साथ पेश आते थे, लेकिन उन्होंने कभी सत्ता के दबाव को स्वीकार नहीं किया और हमेशा सत्य और न्याय का साथ दिया।

निधन

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी का निधन 27 मुहर्रम 1306 हिजरी को तेहरान में हुआ। उनकी मृत्यु का समाचार पूरे ईरान में अत्यंत दुख के साथ सुना गया। उनके जनाज़े में हजारों लोग शामिल हुए, जिनमें विद्वान, विद्यार्थी, आम जनता और विभिन्न वर्गों के लोग शामिल थे। इसके बाद उन्हें हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी के पवित्र रौज़े, शहर-ए-रे में दफन किया गया, जहाँ आज भी विद्वान और श्रद्धालु उनकी कब्र की ज़ियारत करते हैं।

विद्वतापूर्ण रचनाएँ

हाजी मुल्ला अली कनी ने फ़िक़्ह, उसूल, इल्म-ए-रिजाल, हदीस और तफ़्सीर के विषयों पर कई मूल्यवान ग्रंथ छोड़े, जिनमें से अनेक पुस्तकें आज भी विद्वानों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं।

फ़िक़्ही रचनाएँ

  • इरशादुल उम्मत (फ़ारसी रिसाला-ए-अमलिया)
  • तल्ख़ीसुल मसाइल
  • तहक़ीक़ुद दलाइल (तल्ख़ीसुल मसाइल की व्याख्या)
  • जवाहरुल कलाम पर हाशिया

अन्य विद्वतापूर्ण रचनाएँ

  • तौज़ीहुल मक़ाल (इल्म-ए-रिजाल और दिराया के विषय में)
  • ईज़ाहुल मुश्तबहात फ़ी तफ़्सीरिल कलिमातिल मुश्किलतिल क़ुरआनिया
  • मवाइज़े हसना
  • उसूल-ए-फ़िक़्ह के विषयों, विशेष रूप से आदेश, निषेध, अवधारणाओं और इस्तिस्हाब पर कई ग्रंथ

विशेष रूप से "तौज़ीहुल मक़ाल" इल्म-ए-रिजाल की एक महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है, जिससे बाद के हदीस विशेषज्ञों और रिजाली विद्वानों ने व्यापक लाभ उठाया।

संतान और विद्वतापूर्ण उत्तराधिकारी

आयतुल्लाह अल-उज़्मा मुल्ला अली कनी के बाद उनके परिवार के कई लोगों ने धार्मिक सेवाओं की परंपरा को जारी रखा। इनमें आयतुल्लाह शेख़ जवाद कनी प्रमुख थे, जिन्होंने नजफ़ अशरफ़ में अख़ूंद ख़ुरासानी और अन्य महान विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की और बाद में शहर-ए-रे में धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व संभाला।

शेख़ जवाद कनी ने भी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें शामिल हैं:

  • अल-ख़साइसुल अज़ीमिया
  • तज़किरा-ए-रे
  • नूरुल आफ़ाक़
  • अत-तुहफ़तुल अज़ीमिया
  • अल-अख़बारुल अज़ीमिया

ये विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

विद्वतापूर्ण और ऐतिहासिक विरासत

आयतुल्लाह अल-उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी का पूरा जीवन इस सत्य का स्पष्ट उदाहरण है कि एक वास्तविक धार्मिक विद्वान केवल शिक्षा और अध्यापन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा को अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारी समझता है। उन्होंने धार्मिक नेतृत्व को जनता की सेवा, विद्वतापूर्ण शोध, राजनीतिक दूरदृष्टि और साम्राज्यवाद के विरोध के साथ जोड़ा।

रॉयटर समझौते का विरोध, पीड़ितों का समर्थन, धार्मिक संस्थानों का संरक्षण, हजारों विद्यार्थियों का प्रशिक्षण और फ़िक़्ह तथा इल्म-ए-रिजाल की सेवाओं ने उन्हें शिया इतिहास के उन महान धार्मिक नेताओं में शामिल कर दिया, जिनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा। आज भी उनकी विद्वतापूर्ण विरासत, चरित्र, दृढ़ता और धार्मिक स्वाभिमान विद्वानों, विद्यार्थियों और ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन का प्रकाश है।

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